संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:40

संघर्ष--25

धन्नो ने अपनी साड़ी से अपनी दोनो छातिओ को ढँक तो रखी थी लेकिन सारी के पतले होने के कारण उसकी ब्लॉज़ मे दोनो बड़ी बड़ी चुचियाँ का आकार सॉफ समझ मे आ रहा था. पंडित जी की नज़रों को पढ़ते हुए धन्नो ने एक शरीफ औरत की तरह वैसे ही बैठी रही और अपनी नज़रे दूसरी ओर फेर ली जिससे पंडित जी अब अपनी आँखो से उसके शरीर को ठीक तरीके से तौलने लगे. फिर पंडित जी की बात का जबाव देते हुए धन्नो ने पंडित जी से बिना नज़रें मिलाए ही बोली "मुस्किल तो बहुत हो जाएगा बेटी की शादी करना पंडित जी ..क्योंकि सारा गाओं ही मेरे पीछे पड़ा है .....मुझे और मेरी बेटी को बदनाम करने के लिए...क्योंकि सीधे साधे को तो सभी परेशान करतें हैं ....सबको मालूम है की मा बेटी किसी का क्या बिगाड़ लेंगी.......... सो जो मन मे आया झूठ या सच बोलने मे देरी नही करते हैं....अब आप ही बताइए की गाओं की ही करतूत पर मेरी बेटी की शादी टूटी और अब गाओं वाले कहते हैं की मेरी बेटी ही ठीक नही है और इधेर उधेर घूम घूम कर ......हरामी सब और क्या कह सकतें है मेरी बेटी के बारे मे जब वो कुत्ते मेरे उपर भी कलंक लगाते देर नही करते और यहाँ तक बोलते हैं कि मुझे नये उम्र के लड़के पसंद............भगवान इंसबको एक दिन ज़रूर सज़ा देगा जो मुझे भी बदनाम करने मे लगे रहते हैं.......मन तो करता है की गाओं को ही छोड़ कर कहीं और चली जाउ..."

इतना सुनकर पंडित जी ने अपने धोती के उपर से ही लंगोट मे उठते हुए तनाव को एक हाथ से हल्के से मसल दिए जो धन्नो ने अपनी तिर्छि नज़र से देख ली और फिर धोती पर से हाथ हटाते हुए बोले "अरे धन्नो तुम इतनी सी बात को लेकर गाओं छोड़ने की सोच रही हो...ये सब तो होता रहता है........ और जिन लोंगो की खूद की इज़्ज़त नही होती वो ही दूसरे शरीफ लोंगो को बदनाम करते हैं...और जो भी तुमको और तुम्हारी बेटी को बदनाम करते हैं उन सालों का खूद का तो इज़्ज़त होगा ही नही और उन सबकी मा बहनो की आग सारा गाओं मिलकर बुझाता होगा..." पंडित जी के मुँह से लगभग गालियाँ देते हुए ऐसी बात सुनकर धन्नो एकदम लज़ा सी गयी अगले पल अपने हाथ से सारी का पल्लू पकड़ कर मुँह को ढँकते हुए धीरे से हंसते हुए लाज़ भरी मुँह से सावित्री के आँखों मे देखते हुए बोली "हाई राम कैसी बात बोलते हैं बड़ी लाज़ लगती है सुनकर........लेकिन ये सब हरामी ऐसी ही गाली लायक हैं ही जो दूसरों की इज़्ज़त को मिट्टी मे मिलाते रहते हैं...." और इतना कह कर धन्नो सावित्री की ओर देख कर अपनी हँसी रोकने की कोशिस करने लगी. पंडित जी धन्नो का जबाव सुनते ही उन्हे विश्वास हो गया की धन्नो खूब खेली खाई औरत है. और मस्ती की एक लहर पंडित जी के बदन मे उठने लगी और फिर हल्की मुस्कुराहट से बोले "मैं सच कहता हूँ धन्नो ...ये झूठे बदनाम करने वाले कमीने अपनी मा बहनो को नही देखते की दिन और रात हमेशा कुतिया की तरह पूरा गाओं घूमती रहती हैं और पूरा माहौल ही गंदा करने पर लगी रहती हैं..." धन्नो किसी तरह अपनी मुँह को पल्लू मे ढाकी हुई हँसी को रोकते हुए आगे बोली "क्या बताउ पंडित जी मेरे गाओं मे तो कुच्छ औरतें और लड़कियाँ इतनी बेशर्म हो गयी हैं कि उनकी करतूत सुनकर शरीर लाज़ से पानी पानी हो जाता है...आप समझिए की इनका करतूत अपने मुँह से किसी से बताने लायक नही है...." धन्नो इतना कह कर पंडित जी के बालिश्ट शरीर पर तिरछि नज़र से देखते हुए आगे बोली "मानो अब लाज़ और डर तो ख़त्म ही हो गया है इन गाओं की कुत्तिओ के अंदर से..बस रात दिन मज़ा लेने के चक्केर मे अपने साथ साथ अपनी बेटिओं को भी लेकर पूरे गाओं का चक्केर लगाती हैं की कोई तो उनके जाल मे ....मुझे तो इन सबकी ऐसी हरकत देखकर बड़ी ही लाज़ लगती है की आप से क्या कहूँ...ऐसे माहौल मे तो रहना ही बेकार है और मैं चाहती हूँ की अपनी बेटी की शादी कर के जल्दी ससुराल भेंज दूं नही तो इस गाओं का गंदा हवा कही उसे भी लग गया तो मैं तो उजड़ ही जाउन्गि.....

.क्योंकि मेरे पास बस एक इज़्ज़त ही है जिसे मैं बचा के रखी हूँ.." पंडित जी इस बात का जबाव देते हुए बोले "धन्नो तुम शादी की चिंता मत करो भगवान चाहेगा तो तेरी बेटी की शादी बहुत जल्द ही हो जाएगी...बस उपर वाले पर भरोसा करते हुए अपना प्रयास जारी रखो. ..अब मेरे खाना खाने और आराम करने का समय हो गया है और मैं चलता हूँ अंदर वाले कमरे मे और तुम दोनो बातें करो.." इतना कह कर पंडित जी अपनी जगह से उठे और दुकान का बाहरी दरवाज़ा बंद करके दुकान के अंदर वाले कमरे मे चले गये.

दुकान वाले हिस्से मे अब धन्नो और सावित्री चटाई पर बैठी ही थी की पंडित जी के अंदर वाले हिस्से मे जाते ही धन्नो चटाई पर लेट गयी और सावित्री से बोली "तुम भी आराम कर लो..आओ मेरे बगल मे लेट जाओ.." सावित्री चटाई पर बैठी हुई यही सोच रही थी कि धन्नो आज की दोपहर को दुकान पर ही रहेगी तो पंडित जी के साथ कैसे मज़ा लेगी. शायद इस बात को सोच कर सावित्री को धन्नो के उपर गुस्सा भी लग रहा था. वह यही बार बार सोच रही थी की आख़िर धन्नो पंडित जी से इतनी ज़्यादे बातें क्यों कर रही है और दुकान पर क्यों रुक गयी. लेकिन धन्नो चटाई पर लेटी हुई सावित्री के मन की बात समझ रही थी की उसके रुकने की वजह से आज पंडित जी के लंड का मज़ा सावित्री नही ले पाएगी शायद इसी वजह से कुच्छ अंदर ही अंदर गुस्सा कर रही होगी.

धन्नो के दुकान मे रुकने के वजह से सावित्री से भी बातें करने का मौका मिल गया था और वह सावित्री को अपने करीब लाना चाहती थी जो की बात चीत से ही हो सकती थी. यही सोच कर धन्नो ने फिर सावित्री से कहा "पंडित जी तो अंदर चले गये तुम अब आओ और आराम कर लो............की आराम नही करना चाहती हो..शायद तुम जवान लड़कियो को तो थकान होती ही नही चाहे जितना भी मेहनत कर लो..क्यों ?" इतना सुनकर सावित्री चटाई के एक किनारे बैठी हुई बस मुस्कुरा दी और धन्नो की बात का जबाव देते हुए बोली "नही चाची ठीक है...आप आराम करो..मैं बैठी ही ठीक हूँ" फिर धन्नो ने सावित्री की ओर देखते हुए पंडित जी के बारे मे धीरे से पुछि "खाना खाने के बाद कितनी देर तक पंडित जी आराम करते हैं..और तुम कहाँ आराम करती हो?" सावित्री भी काफ़ी धीरे से बोली "यही कोई एक या दो घंटे और फिर दुकान खुल जाती है" लेकिन सावित्री ने दूसरे सवाल का जबाव देना पसंद नही की और इस वजह से चुप रही लेकिन धन्नो ने फिर पुचछा "जब वे आराम करते हैं तो तुम क्या करती हो?" इस सवाल को सुनकर सावित्री एक दम घबरा सी गयी और कुच्छ पल बाद जबाव मे बोली "मैं भी इसी चटाई पर यहीं लेट जाती हूँ" इतना कह कर सावित्री धन्नो के सवालों से पीचछा छुड़ाई ही थी की धन्नो ने दूसरा सवाल फिर रखते बोली "लेकिन पंडित जी के जागने से पहले ही जाग जाती हो या वो आ कर तुम्हे जगाते हैं.? " सावित्री इस सवाल के पुच्छने के पीछे धन्नो चाची की सोच पर गौर करती हुई कुच्छ परेशान सी हुई और बोली "अरे नही चाची वी क्या मुझे जगाएँगे...मैं सोती ही कहा हूँ दिन मे बस ऐसे ही चटाई पर लेट कर दोफर गुज़ार लेती हूँ.." इतना सुन कर धन्नो कुच्छ सलाह देती हुई बोली "हाँ बेटी बाहरी मर्दों से बहुत ही दूरी बना कर रहना चाहिए..इसी मे इज़्ज़त है..बस अपने काम से काम ..आज का जमाना बहुत खराब हो गया है.............. और वैसे ही मर्दों की नियत तो औरतों के उपर हमेशा गंदी ही रहती है बस मौका मिला नही की ..अपने मतलब के चक्केर मे पड़ जातें हैं ...अब रोज़ दोपहर मे तुम यहाँ अकेली ही रहती हो..लेकिन पंडित जी तो बड़े ही भले आदमी हैं इस लिए कोई चिंता की बात नही है ..और इनकी जगह कोई दूसरा आदमी होता तो ज़रूर दोपहर मे तुम्हे अकेले पा कर परेशान करता.." सावित्री चटाई के एक किनारे बैठ कर अपनी नज़रें झुकाए धन्नो की बातें चुप चाप सुन रही थी.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:40

Sangharsh--25

dhanno ne apne saari se apni dono chaation ko dhank to rakhi thi lekin saari ke patle hone ke kaaran uski blauz me dono badi badi chuchian ka akaar saaf samajh me aa rahaa tha. pandit ji ki najron ko padhte huye dhanno ne ek shareef aurat ki tarah vaise hi baithi rahi aur apni nazre dusari or fer li jisase pandit ji ab apni ankho se uske shareer ko theek tareeke se taulne lage. fir pandit ji ki baat ka jabaav dete huye dhanno ne pandit ji se binaa nazren milaaye hi boli "muskil to bahut ho jaayega beti ki shaadi karnaa pandit ji ..kyonki sara gaon hi mere peechhe padaa hai .....mujhe aur meri beti ko badnaam karne ke liye...kyonki seedhe saadhe ko to sabhi pareshaan karten hain ....sabko maloom hai ki maa beti kisi ka kyaa bigaad lengi.......... so jo man me aaya jhooth ya sach bolne me deri nahi karte hain....ab aap hi bataaiye ki gaon ki hi kartoot par meri beti ki shaadi tooti aur ab gaon waale kahte hain ki meri beti hi theek nahi hai aur idher udher ghoom ghoom kar ......haraami sab aur kyaa kah sakten hai meri beti ke baare me jab wo kutte mere upar bhi kalank lagaate der nahi karte aur yahan tak bolte hain ki mujhe naye umra ke ladke pasand............bhagwaan insabko ek din jaroor sazaa dega jo mujhe bhi badnaam karne me lage rahte hain.......man to karta hai ki gaon ko hi chhor kar kahin aur chali jaaun..."

itna sunkar pandit ji ne apne dhoti ke upar se hi langot me uthte huye tanaav ko ek hath se halke se masal diye jo dhanno ne apni tirchhi nazar se dekh lee aur fir dhoti par se haath hataate huye bole "are dhanno tum itni si baat ko lekar gaon chhorne ki soch rahi ho...ye sab to hota rahtaa hai........ aur jin longo ki khood ki izzat nahi hoti we hi dusare shareef longo ko badnaam karte hain...aur jo bhi tumko aur tumhari beti ko badnaam karte hain un saalon ka khood ka to izzat hoga hi nahi aur un sabki maa bahno ki aag sara gaon milkar bujhata hoga..." pandit ji ke munh se lagbhag galian dete huye aisi baat sunkar dhanno ekdam lazaa see gayi agle pal apne haath se saari ka pallu pakad kar munh ko dhankte huye dheere se hanste huye laaz bhari munh se savitri ke aankhon me dekhte huye boli "hai raam kaisi baat bolte hain badi laaz lagti hai sunkar........lekin ye sab haraami aisi hi gali laayak hain hi jo dusaron ki izzat ko mitti me milaate rahte hain...." aur itnaa kah kar dhanno savitri ki or dekh kar apni hansi rokne ki koshis karne lagi. pandit ji dhanno ka jabaav sunkte hi unhe vishwaas ho gayaa ki dhanno khoob kheli khaai aurat hai. aur masti ki ek lahar pandit ji ke badan me uthne lagi aur fir halki muskuraahat se bole "main sach kahta hun dhanno ...ye jhuthe badnaam karne wale kameene apni maa bahano ko nahi dekhte ki din aur raat hamesha kuttion ki tarah pura gaon ghoomti rahti hain aur pura mahaul hi gandaa karne par lagi rahti hain..." dhanno kisi tarah apni munh ko pallu me dhaki hui hansi ko rokte huye aage boli "kya bataaun pandit ji mere gaon me to kuchh aurten aur ladkian itni besharm ho gayi hain ki unki kartoot sunkar shareer laaz se paani paani ho jaata hai...aap samajhiye ki inka kartoot apne munh se kisi se bataane laayak nahi hai...." dhanno itna kah kar pandit ji ke balisht shareer par tirachhi nazar se dekhte huye aage boli "mano ab laaz aur dar to khatm hi ho gayaa hai in gaon ki kuttion ke andar se..bas raat din mazaa lene ke chakker me apne saath saath apni betion ko bhi lekar pure gaon ka chakker lagaati hain ki koi to unke jaal me ....mujhe to in sabki aisi harkat dekhkar badi hi laaz lagti hai ki aap se kyaa kahun...aise mahaul me to rahnaa hi bekaar hai aur main chahti hun ki apni beti ki shaadi kar ke jaldi sasuraal bhenj dun nahi to is gaon ka gandaa hawaa kahi use bhi lag gayaa to main to ujad hi jaaungi.....

.kyonki mere paas bas ek izzat hi hai jise main bachaa ke rakhi hun.." pandit ji is baat ka jabaav dete huye bole "dhanno tum shaadi ki chinta mat karo bhagwaan chahega to teri beti ki shaadi bahut jald hi ho jaayegi...bas upar waale par bharosa karte huye apnaa prayaas jaari rakho. ..ab mere khana khaane aur aaraam karne ka samay ho gayaa hai aur main chalta hun ander waale kamre me aur tum dono baaten karo.." itna kah kar pandit ji apni jagah se uthe aur dukaan ka baahri darwaaza band karke dukaan ke ander waale kamre me chale gaye.

dukaan waale hisse me ab dhanno aur savitri chataai par baithi hi thin ki pandit ji ke ander waale hisse me jaate hi dhanno chataai par let gayi aur savitri se boli "tum bhi aaram kar lo..aao mere bagal me let jaao.." savitri chataai par baithi huyi yahi soch rahi thi ki dhanno aaj ki dopahar ko dukaan par hi rahegi to pandit ji ke saath kaise mazaa legi. shayad is baat ko soch kar savitri ko dhanno ke upar gussa bhi lag rahaa tha. vah yahi baar baar soch rahi thi ki akhir dhanno pandit ji se itni jyaade baaten kyon kar rahi hai aur dukaan par kyon ruk gayi. lekin dhanno chataai par leti huyi savitri ke man ki baat samajh rahi thi ki uske rukne ki vajah se aaj pandit ji ke lund ka mazaa savitri nahi le paayegi shayad isi vajah se kuchh ander hi ander gussa kar rahi hogi.

dhanno ke dukaan me rukne ke vajah se savitri se bhi baaten karne ka maukaa mil gayaa tha aur vah savitri ko apne kareeb lana chahti thi jo ki baat cheet se hi ho sakti thi. yahi soch kar dhanno ne fir savitri se kahaa "pandit ji to ander chale gaye tum ab aao aur aaram kar lo............ki aaram nahi karna chahti ho..shayad tum jawaan ladkion ko to thakaan hoti hi nahi chaahe jitna bhi mehnat kar lo..kyon ?" itna sunkar savitri chataai ke ek kinaare baithi huyi bas muskura dee aur dhanno ki baat ka jabaav dete huye boli "nahi chachi theek hai...aap aaram karo..main baithi hi theek hun" fir dhanno ne savitri ki or dekhte huye pandit ji ke baare me dheere se puchhi "khana khaane ke baad kitni der tak pandit ji aaram karte hain..aur tum kahaan aaram karti ho?" savitri bhi kafi dheere se boli "yahi koi ek ya do ghante aur fir dukaan khul jaati hai" lekin savitri ne dusare sawaal ka jabaav denaa pasand nahi ki aur is vajah se chup rahi lekin dhanno ne fir puchha "jab ve aaram karte hain to tum kyaa karti ho?" is savaal ko sunkar savitri ek dam ghabra si gayi aur kuchh pal baad jabaav me boli "main bhi isi chataai par yahin let jaati hun" itna kah kar savitri dhanno ke savaalon se peechha chhudaayi hi thi ki dhanno ne dusraa sawaal fir rakhte boli "lekin pandit ji ke jagne se pahle hi jag jaati ho yaa we aa kar tumhe jagaate hain.? " savitri is savaal ke puchhne ke peechhe dhanno chachi ki soch par gaur karti hui kuchh pareshaan see huyi aur boli "are nahi chachi we kya mujhe jagaayenge...main soti hi kahaa hun din me bas aise hi chataai par let kar dophar gujaar leti hun.." itna sun kar dhanno kuchh salaah deti hui boli "han beti baahari mardon se bahut hi duri banaa kar rahnaa chahiye..isi me izzat hai..bas apne kaam se kaam ..aaj ka jamana bahut kharaab ho gayaa hai.............. aur vaise hi mardon ki niyat to aurton ke upar hameshaa gandi hi rahti hai bas mauka mila nahi ki ..apne matlab ke chakker me pad jaaten hain ...ab roz dopahar me tum yahaan akeli hi rahti ho..lekin pandit ji to bade hi bhale aadmi hain is liye koi chinta ki baat nahi hai ..aur inki jagah koi dusra aadmi hota to jaroor dopahar me tumhe akele paa kar pareshaan kartaa.." savitri chataai ke ek kinaare baith kar apni nazren jhukaaye dhanno ki baaten chup chap sun rahi thi.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 20 Dec 2014 08:42

संघर्ष--26

धन्नो भी आज मौका . देख कर सावित्री से गरम गरम बातें करना चाहती थी. धन्नो खूब अच्छि तरह जानती थी की इस उम्र की जवान लड़कियाँ कैसे गंदी बातें ध्यान से सुनती हैं और मर्दों से मज़ा . के सपने देखती हैं. यही सब सोचते हुए धन्नो ने आज सावित्री को दुकान वाले हिस्से मे अकेले पा कर धीरे धीरे बाते सुरू करना चाहती थी. धन्नो को इस बात का विश्वास था की बस थोड़ी सी मेहनत के बाद सावित्री उससे खूल जाएगी और फिर जब सावित्री को लंड की प्यास लगना सुरू हो जाएगा तब खूब मर्दों के फिराक मे रहेगी और ऐसे मे नये उम्र के लड़के भी जब सावित्री के चक्कर मे पड़ेंगे तो मौका देख कर धन्नो भी उन मे से किसी को फाँस कर मज़ा ले पाएगी. धन्नो की उम्र सावित्री से ज़्यादे होने के नाते धन्नो काफ़ी सावधानी से सावित्री से धीरे धीरे मौज़ मस्ती की बातें सुरू करना चाहती थी. और आज मौका काफ़ी बढ़िया देख कर धन्नो ने बात आगे बढ़ाती हुई बोली "तुमने अच्छा किया जो काम पकड़ लिया ..इससे तुम्हे दो पैसे की आमदनी भी हो जाएगी और तुम्हारा मन भी बहाल जाएगा..नही तो गाओं मे तो कहीं आने जाने लायक नही है औरतों के लिए... हर जगह आवारे कमीने घूमते रहते हैं जिन्हे बस शराब और औरतों के अलावा कुच्छ दिखाई ही नही देता. "

धन्नो चटाई पर लेटी हुई सावित्री के चेहरे के भाव को ध्यान से देखती हुई अब बात चीत मे कुच्छ गर्मी डालने के नियत से आगे बोली "लेकिन ये गाओं वाले कुत्ते तुम्हारे कस्बे मे काम पर आने जाने को भी अपनी नज़र से देखते हैं बेटी..मैने किसी से सुना की वी सब तुम्हारे साथ पंडित जी का नाम जोड़ कर हँसी उड़ाते हैं..मैने तो बेटी वहीं पर कह दिया की जो भी इस तरह की बात करे भगवान उसे मौत दे दे...सावित्री को तो सारा गाओं जानता है की बेचारी कितनी सीधी और शरीफ है...भला कोई दूसरी लड़की रहती तो कोई कुच्छ शक़ भी करे लेकिन सावित्री तो एक दम दूध की धोइ है..." धन्नो इस बात को बोलने के साथ अपनी नज़रों से सावित्री के चेहरे के भाव को तौलने का काम भी जारी रखा. इस तरह का चरित्रा. पर हमले की आशंका को भाँपते हुए सावित्री के चेहरे पर परेशानी और घबराहट सॉफ दिखने लगा. साथ ही सावित्री ने धन्नो के तरफ अपनी नज़रें करते हुए काफ़ी धीरे से और डरी हुई हाल मे पुछि "कौन ऐसी बात कह रहा था..आ" धन्नो हमले को अब थोड़ा धीरे धीरे करने की नियत से बोली "अरे तुम इसकी चिंता मत करो ..गाओं है तो ऐसी वैसी बातें तो औरतों के बारे मे होती ही रहती है...मर्दों का काम ही होता है औरतों को कुच्छ ना तो कुच्छ बोलते रहना ..इसका यह मतलब थोड़ी है की जो मर्द कह देंगे वह सही है...लेकिन मेरे गाओं की कुच्छ कुतिआ है जो बदनाम करने के नियत से झूठे ही दोष लगाती रहती हैं बेटी...बस इन्ही हरजाओं से सजग रहना है..ये सब अपने तो कई मर्दों के नीचे............. और शरीफ औरों को झूठे ही बदनाम करने के फिराक मे रहती हैं." फिर भी सावित्री की बेचैनी कम नही हुई और आगे बोली "लेकिन चाची मेरे बारे मे आख़िर कोई क्यों ऐसी बात बोलेगा?" धन्नो ने सावित्री के . और बेचैनी को कम करने के नियत से कही "अरे तुम तो इतना घबरा जा रही हो मानो कोई पहाड़ टूट कर गिर पड़ा हो...बेटी तुम ये मत भूलो की एक औरत का जन्म मिला है तुम्हे ......और ...औरत को पूरी जिंदगी बहुत कुच्छ बर्दाश्त करना पड़ता है..इतना घबराने से कुच्छ नही होगा...गाओं मे हर औरत और लड़की के बारे मे कुच्छ ना तो कुच्छ अफवाह उड़ती रहती है...झूठे ही सही..हम औरतों का काम है एक कान से सुनो तो दूसरे कान से निकाल देना..." धन्नो की इन बातों को सावित्री काफ़ी ध्यान से सुन रही थी और तभी अंदर वाले कमरे से पंडित जी के नाक बजने की . आने लगी और अब पंडित जी काफ़ी नीद मे सो रहे थे.

फिर धन्नो ने बात आगे बढ़ाते हुए काफ़ी धीमी आवाज़ मे लगभग फुसूस्सते हुए बोली "देख .मेरा गाओं ऐसा है की चाहे तुम शरीफ रहो या बदमाश ..बदनाम तो हर हाल मे होना है क्योंकि ये आवारों और कमीनो का गाओं है....किसी हाल मे यहाँ बदनामी से बचना मुस्किल है...चाहे कोई मज़ा ले चाहे शरीफ रहे ..ये कुत्ते सबको एक ही नज़र से देखते हैं ...तो समझो की तुम चाहे लाख शरीफ क्यों ना रहो तुम्हे छिनाल बनाते देर नही लगाते..."

फिर धन्नो बात लंबी करते बोली "ऐसी बात भी नही है कि वो सब हमेसा झूठ ही बोलते है सावित्री ...मेरे गाओं मे बहुत सारी छिनार किस्म की भी औरतें हैं जो गाओं मे बहुत मज़ा लेती हैं....तुम तो अभी बच्ची हो क्या जानोगी इन सब की कहानियाँ की क्या क्या गुल खिलाती हैं ये सब कुट्तिया...कभी कभी तो इनके करतूतों को सुनकर मैं यही सोचती हूँ कि ये सब औरत के नाम को ही बदनाम कर रही हैं...बेटी अब तुम्हे मैं कैसे अपने मुँह से बताउ ...तुमको बताने मे मुझे खूद ही लाज़ लगती है..की कैसे कैसे गाओं की बहुत सी औरतें और तुम्हारी उम्र की लड़कियाँ उपर से तो काफ़ी इज़्ज़त से रहती हैं लेकिन चोरी च्छूपे कितने मर्दों का ...छी बेटी क्या कहूँ मेरे को भी अच्च्छा नही लगता तुमसे इस तरह की बात करना .....लेकिन सच तो सच ही होता है...और यही सोच कर तुमसे बताना चाहती हूँ की अब तुम भी जवान हो गयी हो इसलिए ज़रूरी भी है की दुनिया की सच्चाई को जानो और समझो ताकि कहीं तुम्हारे भोलेपन के वजह से तुम्हे कोई धोखा ना हो जाय."

धन्नो के इस तरह की बातों से सावित्री के अंदर बेचैनी के साथ साथ कुच्छ उत्सुकता भी पैदा होने लगी की आगे धन्नो चाची क्या बताती है जो की वह अभी तक नही जानती थी. शायद ऐसी सोच आने के बाद सावित्री भी अब चुप हो कर मानो अपने कान को धन्नो चाची के बातों को सुनने के लिए खोल रखी हो. धन्नो चाची सावित्री के जवान मन को समझ गयी थी की अब सावित्री के अंदर समाज की गंदी सच्चईओं को जानने की लालच पैदा होने लगी है और अगले पल चटाई पर धीरे से उठकर बैठ गयी ताकि सावित्री के और करीब आ करके बातें आगे बढ़ाए और वहीं सावित्री लाज़ और डर से अपनी सिर को झुकाए हुए अपनी नज़रे दुकान के फर्श पर गढ़ा चुकी हो मानो उपर से वह धन्नो चाची की बात नही सुनना चाहती हो.